शेर-ए-पंजाब (महाराजा रणजीत सिंह)

महाराजा रणजीत सिंह (1780-1839)


यूं तो भारतीय इतिहास में कई राजा हुए किंतु जब महानतम राजाओं की बात की जाती है तो उनमें महाराजा रणजीत सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। जिन्होंने 40 वर्षो तक पंजाब राज्य पर एकछत्र राज किया आइये जानते हैं उनके बारे में..

महाराजा रणजीत सिंह 
शासन काल (1799-1839)


प्रारंभिक जीवन: महाराजा रणजीत सिंह का जन्म 13 नवंबर 1780 में हुआ। उनके पिता महां सिंह सुकरचकिया मिस्ल के प्रमुख थे और उनकी माता राज कौर थी। उनके बचपन का नाम बुद्ध सिंह था।

मिस्ल अर्थात एक स्वतंत्र राज्य, पूरे पंजाब राज्य में ऐसी कुल 14 मिस्ल थी जिसमें से 12 पर सिखों का शासन था, एक पर मुस्लिम शासक और एक पर अंग्रेजों का शासन था। 

बचपन में चेचक रोग होने के कारण उनकी एक आंख की रोशनी चली गई । 1792 में जब वे 12 वर्ष के थे तब उनके पिताजी का देहांत हो गया। इसके बाद माँ राज कौर के संरक्ष्ण में उन्हीने युद्ध कला आदि चीज़े सीखी। 1798 में उनकी माता का भी निधन हो गया।


सिख राज्य: सन 1797 में रणजीत सिंह ने अफगान के मुस्लिम शासक शाह जमान को हराया। उसके बाद 1799 में सबसे शक्तिशाली मिस्ल, लाहौर के भंगी सिखों को हराया। रणजीत सिंह ने 1799 में मात्र 19 वर्ष की आयु में पूरी 14 मिस्लो को मिलाकर सिख राज्य की स्थापना की। 12 अप्रैल 1801 बैसाखी के दिन महाराजा रणजीत सिंह को पंजाब का महाराजा घोषित किया गया।

राज्य विस्तार : 

  •  1802 में उन्होंने भंगी सिख मिस्ल से अमृतसर को भी जीत लिया।
  • 1808 में रणजीत सिंह ने सतलज नदी पार करके फरीदकोट, मुलेरकोटला और अम्बाला पर कब्जा कर लिया।
  • 1817  में मुल्तान (वर्तमान-पाकिस्तान में ),  1818 में कश्मीर तथा 1823 में पेशावर(वर्तमान-पाकिस्तान में) पर अधिकार कर लिया। 


कोहिनूर हीरा: 1809 में शाहशुजा (अहमद शाह अब्दाली का पौत्र) जिसे उसके भाई ने अपदस्थ कर दिया था, लाहौर में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहा था, रणजीत सिंह ने उसे पुन: सत्ता प्राप्त करने में सहायता दी। राजा रणजीत सिंह को अफगान शासक शाहशुजा से ही प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा प्राप्त हुआ।


*अहमद शाह अब्दाली-  अफगान शासक 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठाओं को हराया था। 

अंग्रेजो के साथ सम्बन्ध: रणजीत सिंह के शासन से अंग्रेज इतना भयभीत थे कि उन्होंने रणजीत सिंह से संधि कर ली थी।

धार्मिक कार्य:

  • महाराजा रणजीत सिंह ने अमृतसर स्वर्ण मंदिर (हरमंदिर साहिब) का जीर्णोद्धार कार्य करवाया। 750 किलो सोना भी दिया। उसी के बाद से हरमंदिर साहिब का नाम स्वर्ण मंदिर भी पड़ा।
  • काशी विश्वनाथ मंदिर के ऊपरी भाग को स्वर्ण मंडित करने के लिए लगभग 900 किलो सोना दिया।
  • अनेको मस्जिदों का भी जीर्णोद्धार करवाया।
  • हिन्दू और सिखों पर लगने वाला जजिया कर समाप्त किया।
*जजिया कर: गैर-मुस्लिमो पर लगाया जाने वाला धार्मिक यात्रा टैक्स।

मृत्यु: महाराजा रणजीत सिंह को 1838 में लकवा हुआ और 27 जून 1839 को इस महानतम योद्धा ने अंतिम सांस ली।


अमृतसर स्थित महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति

आज महाराजा रणजीत सिंह जी की 241 वीं जयंती है पूरा राष्ट्र आपको शत-शत नमन करता है।


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